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भारत का पहला Bio-Weapon Murder! कहानी 1933 के Pakur Murder Mystery की
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सारांश
वीडियो 1933 के पाकुड़ हत्या मामले को भारत के शुरुआती जैविक हथियार-आधारित हत्या मामलों में से एक के रूप में पेश करता है। इसकी पृष्ठभूमि में उस समय की जैविक युद्ध की आशंकाओं और 1925 के जिनेवा प्रोटोकॉल का उल्लेख है, जिसने युद्ध में बैक्टीरियोलॉजिकल तरीकों के इस्तेमाल पर रोक लगाई थी।
26 नवंबर 1933 को 20 वर्षीय अमरेंद्र चंद्र पांडे हावड़ा स्टेशन से पाकुड़ लौट रहे थे। भीड़ में शॉल ओढ़े एक व्यक्ति उनसे टकराया और अमरेंद्र की बांह पर सुई चुभने जैसा निशान रह गया। उनकी बहन बनबाला ने उस व्यक्ति को पहले एक सिनेमाघर के बाहर देखने की बात कही, लेकिन शुरुआत में परिवार ने इसे संयोग समझा।
बाद में अमरेंद्र की बांह पर सूजन हुई और उन्हें तेज बुखार आया। कोलकाता लौटने के बाद उनकी हालत बिगड़ती गई और वे चल बसे। मृत्यु का कारण पहले सेप्टिक निमोनिया बताया गया और उनका अंतिम संस्कार बिना पोस्टमार्टम के कर दिया गया।
8 दिसंबर को आई रक्त-जांच की रिपोर्ट ने मामला बदल दिया। पैथोलॉजिस्ट डॉ. संतोष कुमार गुप्ता और कैप्टन पसरीचा की जांच में अमरेंद्र के खून में प्लेग के जीवाणु Yersinia pestis पाए गए। चिकित्सकीय जांच के बाद मेडिकल बोर्ड ने माना कि संक्रमण स्वाभाविक रूप से नहीं हुआ, बल्कि संभवतः सुई के जरिए जानबूझकर पहुंचाया गया था। इससे हत्या की जांच शुरू हुई।
जांच में सामने आया कि तारानाथ भट्टाचार्य—जो खुद को उष्णकटिबंधीय चिकित्सा का जानकार बताता था—ने मुंबई के हाफकिन संस्थान से प्लेग कल्चर हासिल करने की कोशिश की थी। वीडियो के अनुसार, संस्थान से सीधे कल्चर न मिलने पर उसने अपने साथी के साथ अस्पताल और प्रयोगशाला तक पहुंच बनाकर प्लेग के जीवाणु हासिल किए और उन्हें कोलकाता ले आया।
अमरेंद्र के वकील कालीदास गुप्ता की समानांतर पड़ताल और पुलिस जांच ने तारानाथ के साथी की पहचान अमरेंद्र के बड़े सौतेले भाई विनोदेंद्र चंद्र पांडे के रूप में की। पुलिस ने यह भी माना कि स्टेशन पर सुई चुभाने वाला व्यक्ति एक भाड़े का हमलावर था, जिसकी पहचान या ठिकाना बाद में पता नहीं चला।
वीडियो के मुताबिक, हत्या का मुख्य कारण संपत्ति का विवाद था। पिता की मृत्यु के बाद विनोदेंद्र परिवार की संपत्ति का संरक्षक बना, जबकि अमरेंद्र बालिग होने पर संपत्ति का हिसाब और कानूनी बंटवारा मांगने लगा। अमरेंद्र कानूनी लड़ाई में आगे बढ़ रहा था और विनोदेंद्र को अपनी संपत्ति खोने का डर था।
इससे पहले भी विनोदेंद्र ने अमरेंद्र को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की थी। 1932 में उसने टिटनेस से दूषित चश्मे के जरिए संक्रमण फैलाने का प्रयास किया, लेकिन डॉक्टरों के इलाज से अमरेंद्र बच गया। वीडियो के अनुसार, इसके बाद विनोदेंद्र ने प्लेग के जीवाणुओं का इस्तेमाल करने की योजना बनाई।
अदालत ने विनोदेंद्र और तारानाथ को साजिश तथा हत्या में दोषी ठहराकर मृत्युदंड सुनाया। हालांकि, 10 जनवरी 1936 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने विनोदेंद्र की सजा को उम्रकैद में बदल दिया, क्योंकि सुई चुभाने वाले मुख्य हमलावर को पकड़ा नहीं जा सका था। उसने लगभग 11 साल जेल में बिताए और 1947 में रिहा हुआ। बाद में पाकुड़ में पुलिस के साथ मुठभेड़ में उसकी मृत्यु हो गई। सुई चुभाने वाला व्यक्ति कभी नहीं मिला; उसके बारे में केवल अनुमान लगाए गए।
प्रस्तोता और योगदानकर्ता
- शुभम — प्रस्तोता
- सर्वेश — कैमरे के पीछे सहयोगी
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